गुणायतन एक परिचय

जैन दर्शन के अनुसार आत्मा ही परमात्मा है । प्रत्येक आत्मा अनन्त शक्तियों का पिण्ड है । किसी आत्मा में आत्म शक्तियां पूर्ण प्रकट होती है
तो किसी में कम | जैसे काली अंधियारी सघन घटाएँ सूर्य के प्रकाश को मंद कर देती है । वैसे ही कर्मावरण की सघन घटाएँ आत्म शक्तियों को प्रभावित कर देती हैं । जैसे-जैसे मेघ घटाएँ विरल होती हैं सूर्य का प्रकाश और प्रताप बढ़ने लगता है । मेघ घटाओं के पूर्ण नष्ट होने पर सूर्य का प्रकाश और प्रताप पूर्णतः प्रकट हो जाता है | वैसे ही जैसे जैसे कर्मावरण की घटाएँ क्षीण होती हैं आत्मशक्तियों का प्रकाश बढ़ने लगता है तथा कर्मावरण के पूर्ण नष्ट होने पर आत्मशक्तियों की पूर्ण अभिव्यक्ति हो जाती है । यही परमात्म अवस्था है । इन्हें ही भगवान अर्हंत अथवा तीर्थंकर कहते हैं ।

जैनदर्शन में आत्मशक्तियों के विकास के क्रमिक सोपानों को चौदह गुणस्थानों द्वारा बहुत सुन्दर ढंग से विवेचित किया गया है । “गुणस्थान” जैनदर्शन का एक विशिष्ट पारिभाषिक शब्द है । जैन दर्शन के अनुसार जीव के आवेग-संवेगों और मन वचन काय की प्रवृत्तियों के निमित्त से उसके अन्तरंग भावों में उतार-चढ़ाव होता रहता है । जिन्हें गुणस्थानों द्वारा बताया जाता है । गुणस्थान जीव के भावों को मापने का पैमाना है । यह जीव के अन्तरंग परिणामों में होने वाले उतार चढ़ाव का बोध कराता है । साधक कितना चल चुका है और कितना आगे उसे और चलना है गुणस्थान इस यात्रा को बताने वाला मार्ग सूचक पट्ट है । गुणस्थानों के माध्यम से ही जीव की मोह और निर्मोह दशा का पता चलता है । इससे ही संसार और मोक्ष के अन्तर का पता चलता है । कुल मिलाकर आत्मा से परमात्मा तक की शिखर यात्रा में होने वाले आत्म विकास की सारी कहानी हमें गुणस्थानों द्वारा पता चलती है । समग्र जैन तत्वज्ञान और कर्म सिद्धांत का विवेचन इन्हीं गुणस्थानों द्वारा किया जाता है |

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