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गुणायतन
आत्म विकास का दिव्य सदन
जैन दर्शन में आत्मशक्तियों के विकास अथवा आत्मा से परमात्मा बनने की शिखर यात्रा के क्रमिक सोपानों को चौदह गुणस्थानों द्वारा बहुत सुंदर ढंग से विवेचित किया गया है. -
गुणायतन
आत्म विकास का दिव्य सदन
जैन दर्शन में आत्मशक्तियों के विकास अथवा आत्मा से परमात्मा बनने की शिखर यात्रा के क्रमिक सोपानों को चौदह गुणस्थानों द्वारा बहुत सुंदर ढंग से विवेचित किया गया है.
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जैन दर्शन में आत्मशक्तियों के विकास अथवा आत्मा से परमात्मा बनने की शिखर यात्रा के क्रमिक सोपानों को चौदह गुणस्थानों द्वारा बहुत सुंदर ढंग से विवेचित किया गया है.
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जैन दर्शन में आत्मशक्तियों के विकास अथवा आत्मा से परमात्मा बनने की शिखर यात्रा के क्रमिक सोपानों को चौदह गुणस्थानों द्वारा बहुत सुंदर ढंग से विवेचित किया गया है.
पंचायतन मंदिर
परम श्रद्धेय संत शिरोमणि आचार्यश्री १०८ विद्यासागरजी महाराज एवं निर्ग्रथगौरव मुनिश्री १०८ प्रमाणसागरजी महाराज मंगल आशीर्वाद से गुणायतन प्रगति के पथ पर निर्बाध गति से अग्रसर है। जैसा कि सर्वविदित है परम पूज्य गुरुदेव ने गुणायतन की परिकल्पना मात्र एक परियोजना के रूप में नहीं की है, अपितु उनकी कल्पना में गुणायतन एक अभियान बन कर उभरा है।
इस अभियान मैं सबसे प्राथमिकता पर है- ‘ठोस पत्थर के अद्वितीय मंदिर एवं कीर्ति स्तंभ सह-सहस्रकूट जिनालय’ का शाश्वत सिद्ध क्षेत्र श्री सम्मेदशिखर जी की पावन धरा पर निर्माण । परम पूज्य गुरुदेव के अनुसंधान व पुरुषार्थ के आधार पर आकार लेते इस आश्चर्यजनक उत्कीर्णन से सजे जिनालय का निर्माण निरंतर प्रगति के मार्ग पर अग्रसर है । यह मंदिर निर्माण की प्राचीनतम शैली ‘पंचायतन’ पर आधारित है । ५ मंदिरों के इस समूह के मुख्य मंदिर एवं मंदिर के चारों कोनों पर बनने वाले मंदिरों का निर्माण पूर्ण हो चुका है।
प्रथम तल मंडोवर

प्रथम तल मंडोवर
जिनालय की बाहरी दीवार जिसे मंडोवर कहा जाता है, की प्रथम पंक्ति में शक्ति के प्रतीक हाथी दिखाए गए हैं। गजराज के ऊपर इंद्र-इंद्राणी प्रसन्न मुद्रा में जोड़े के साथ जिनालय की ओर जाते हुए दिखाए गए हैं। द्वितीय पंक्ति में बेल अंकित की गई है, जो कि प्रगति के प्रतीक के रूप में है। तृतीय पंक्ति में पुष्प हैं, जो कि प्रसन्नता की अभिव्यक्ति करता है। चतुर्थ पंक्ति में इन्द्र अलग-अलग मुद्राओं में दिखाए गए हैं।

६४ ऋद्धि के प्रतीक ६४ स्तंभ
६४ ऋद्धि के प्रतीक ६४ स्तंभों का उल्लेख विशेष रूप से तंत्र-मंत्र की प्राचीन विद्या में किया जाता है। यहां "६४ स्तंभ" का प्रतीक विभिन्न सिद्धियों और शक्तियों के रूप में होता है। हर स्तंभ को एक विशिष्ट सिद्धि या ऋद्धि से जोड़ा जाता है, जैसे ध्यान, तप, साधना, और विशेष प्रकार की मानसिक और शारीरिक शक्तियाँ।

मुख्य स्तंभ
उसी के ऊपर में एक समुद्री जीव को अंकित किया गया है, जिसे 'ग्रासमुख' कहा जाता है, जो सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है। जिनालय में भूतल तथा प्रथम तल पर चतुर्मुखी द्वार हैं, उत्तर दिशा से जिनालय में प्रवेश होगा।

वागला
प्रत्येक दो इन्द्रों के बीच 'वागला' की आकृति दिखाई गई है, जो नकारात्मक ऊर्जा को जिनालय में प्रवेश नहीं करने देता है। स्तंभों पर आधारित इस जिनालय के भूतल पर ६४ स्तंभों का निर्माण किया गया है। सभी स्तंभ मिन्न- भिन्न प्रकार की नक्काशी से सुसज्जित हैं, जिनमें मुख्य रूप से वीतरागता की प्रतीक मुनि मुद्रा को दर्शाया गया है। भूतल में गंध कुटी के आधार के रूप में एक मुख्य स्तंभ का निर्माण किया गया है। ६४ चँवर झुलाते हुए इंद्र बनाए गए हैं।
चौदह गुणस्थान
जैन दर्शन में आत्मशक्तियों के विकास अथवा आत्मा से परमात्मा बनने की शिखर यात्रा के क्रमिक सोपानों को चौदह गुणस्थानों द्वारा बहुत सुंदर ढंग से विवेचित किया गया है. जैन दर्शन में जीव के आवेगों-संवेगों और मन-वचन-काय की प्रवत्तियों के निमित्त से अन्तरंग भावों में होने वाले उतार-चढ़ाव को गुणस्थानों द्वारा बताया जाता है. गुणस्थान जीव के भावों को मापने का पैमाना है.
दादरी-I पूर्व दिशा सीलिंग
प्रथम तल में जैसे ही प्रवेश करेंगे प्रवेश द्वार की सीलिंग में इन्द्रों की अलग-अलग स्वागत मुद्राएँ श्रीजी के दर्शनार्थियों का स्वागत करती प्रतीत होती है। चार द्वारों पर सोलह कारण भावना के प्रतीक के रूप में १६ स्तंभों का निर्माण किया गया है। मंडोवर में प्रथम पंक्ति में गज का बाल्य रूप अलग-अलग मुद्राओं में दिखाया गया है, जो नृत्य करते जिनालय के प्रथम तल के मध्य भूतल में स्थित मुख्य हुए जिनालय की ओर अग्रसर है। उसी के ऊपर हँस एवं मोर स्तंभ के ऊपर ही गंध कुटी का निर्माण किया जाएगा एवं गंध की मुद्रा दिखाई गई है।

मुख्य शिखर दादरी के गड़ाई एवं फिटिंग का कार्य
मंडोवर पर ही प्रत्येक दिशा में ६-६ झरोखे बनाए गए हैं। चारों दिशाओं में ऐसे कुल २४ झरोखे है। जिनमें अंदर का बाहर और बाहर का अंदर नजर नहीं आता है। मुख्य मंदिर के प्रथम तल के अंदर भी २४ स्तंभ का निर्माण किया गया है, जिन पर अलग-अलग नक्काशी एवं अलग-अलग मुद्राएँ अंकित की गई हैं। जैसे-इन्द्र-इंद्राणी, मंगल कलश आदि। स्तंभों के ऊपर मुख्य छतों का निर्माण किया गया है। इन छतों पर नक्काशी का एक अलग ही अद्भुत रूप दिखाया गया है।

दादरी-II पूर्व दिशा सीलिंग
हंस को विवेक का और मोर को कुटी में श्रीजी की पद्मासन में ४ प्रतिमाएँ विराजमान होगी, प्रसन्नता का प्रतीक माना जाता है। हमारे महाराजश्री भी जिससे कि ऐसा प्रतीत होगा कि हम समवसरण में आ गए हैं कहते हैं- यदि मानव अपने जीवन में विवेक रखे और प्रत्येक और साक्षात श्रीजी की दिव्य ध्वनि सुन रहे हैं। यहाँ पर श्रीजी कार्य प्रसन्नता से करे तो उसके जीवन में सुख-शांति व विराजमान होंगे। इस मुख्य छत की कलाकृतियों में पूरे समृद्धि अपने आप ही आएगी। मानवीय गुणों को दर्शाया गया है।

उत्तर चौकी सीलिंग
जिनालय के प्रथम तल के मध्य भूतल में स्थित मुख्य स्तंभ के ऊपर ही गंध कुटी का निर्माण किया जाएगा एवं गंध कुटी में श्रीजी की पद्मासन में ४ प्रतिमाएँ विराजमान होगी, जिससे कि ऐसा प्रतीत होगा कि हम समवसरण में आ गए हैं और साक्षात श्रीजी की दिव्य ध्वनि सुन रहे हैं। यहाँ पर श्रीजी विराजमान होंगे। इस मुख्य छत की कलाकृतियों में पूरे मानवीय गुणों को दर्शाया गया है। यह मुख्य छत का एक छोटा सा हिस्सा है, जिससे मानव के वांछित गुणों की भावनात्मक परिणति के प्रतीकात्मक रूप को दर्शाती है।

पंचायतन शैली को पूर्णतः प्रदान करते हुए ‘ज्ञानमंदिर’ के साथ ४ छोटे मंदिर का कार्य
जैनदर्शन में आत्मशक्तियों के विकास के क्रमिक सोपानों का १४ गुणस्थानों द्वारा बहुत सुंदर ढंग से विवेचन किया गया है। १४ गुनस्थानों की इस संकल्पना का जीवंत चित्रण गुणायतन का दूसरा मुख्य ध्येय है।
‘गुणस्थान’ जैनदर्शन का एक विशिष्ट पारिभाषिक शब्द है।
जैनदर्शन के अनुसार जीव के आवेग, संवेग और मन, वचन, काय की प्रवृत्तियों के निमित्त से उसके अंतरंग भावों में उतार-चढ़ाव होता है, जिन्हें गुणस्थान द्वारा मापा जाता है, जीव के भावों का पैमाना है यह गुणायतन, जो अंतरंग के परिणामों में होने वाले उतार-चढ़ाव का बोध कराता है।


जीव अपनी स्वतंत्रता के मार्ग पर कितना चल चुका और कितना आगे उसे और चलना है, १४ गुणस्थान इस यात्रा को बताने वाला मार्ग सूचक पट है। १४ गुणस्थान के माध्यम से ही जीव की मोही व निर्मोही दशा का पता लगता है और इससे ही संसार और मोक्ष के अंतर का पता लगता है। कुल मिलाकर आत्मा से परमात्मा तक की शिखर यात्रा में होने वाले आत्म विकास की सारी कहानी हमें गुणस्थानों द्वारा पता चलती है। समग्र जैन तत्त्वच ज्ञान और कर्म सिद्धान्त का विवेचन इन्हीं गुणस्थानों में समाहित है। इन सिद्धांतों को सरल तरीके से समाज और विशेष रूप से युवा वर्ग तक पहुँचाने का यह अभियान संभवतः संसार में प्रथम है। इसमें प्रयोग की जाने वाली तकनीक अत्यंत आधुनिक एव इनमें से कुछ तकनीकी संभवतः विश्व में प्रथम बार प्रयोग की जा रही है। एनीमेशन, होलोग्राम एवं ११० अनुभवयुक्त ४D प्रेक्षागृह में शब्द, संगीत एवं प्रकाशयुक्त, यथार्थपूर्ण अद्भुत अनुभूति गुणायतन के नए ऑडिटोरियम में दर्शक गण पाएंगे। साथ ही पाएंगे आत्मा से परमात्मा बनने की जीवंत झांकियों के साथ संसारी जीवों की विभिन्न भूमिकाओं के अनुरूप उनके चिंतन और चर्या का सहज बोध। गुणायतन में बनने वाले दूसरे ऑडिटोरियम को कुछ यूँ चित्रित किया जाएगा कि दर्शक स्वयं को भगवान के समवसरण के बीच पाएगा। कुछ देर के लिए तो वह माया, मोह कषाय से ऊपर उठ कर भगवान के सान्निध्य का अनुभव करेगा और इसी अनुभव से मिले आनंद की अनुभूति दर्शक के हृदय में उत्कंठा एवं धर्म की पावन प्रेरणा का आधार बनेगी।
तीसरा एवं गुरुदेव की दृष्टि में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंग है समाज का गुणात्मक परिवर्तन।
उसकी पहल की गई है समाज के प्रत्येक वर्ग को गुणायतन से सदस्य के रूप में जोड़ना। आज गुणायतन के लगभग ११००० सदस्य देश और विदेश में है। गुणायतन एक परिवार के रूप में उभर रहा है। सभी सदस्य आपस में व्हाट्सएप ग्रुपों व अन्य संचार माध्यमों के द्वारा जुड़े हैं। प्रमाणिक एप, गुणायतन वेबसाइट, तीर्थेश एवं व्हाट्सएप ग्रुपों के माध्यम से लगभग प्रतिदिन गुरुदेव के मार्गदर्शन का लाभ सभी सदस्य लेते हैं। यह धीरे-धीरे सदस्यों व उनके परिवारों के हृदय परिवर्तन का आधार बन रहा है और यही व्यक्तिगत रूप से होने वाला परिवर्तन समूह रूप में समाज का गुणात्मक परिवर्तन होगा और हो भी रहा है। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जिनमें जैन एवं अजैन व्यक्तियों ने परम पूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन से अपने जीवन में गुणात्मक परिवर्तन घटित कर विशुद्धि के अगले सोपानों पर पग रखा है।

गुणायतन भाग

मंदिर का शिखर

सामरण – I अम्लासर तक

सामरण – II अम्लासर तक
